Monday, December 14, 2009

देवदास सा मैं पागल

न मदिरा कि प्यास मुझे,
ना काम बिना मदिरा चलता |
न देवदास सा मैं पागल  ,
न बिन पारो ही मन लगता |


ग्वालाये रास नहीं आती,
नाही राधा ही मन भाती |
न कोई स्वर्ग कि चाह मुझे,
न बिना मेनका आँख लगे |


व्यथा मेरी सुनकर अक्सर,
संसार ये कहता है हंस कर |
राम राम कि बेला में,
देखो बैठा है फिर पीकर  |

8 comments:

  1. व्यथा मेरी सुनकर अक्सर,
    संसार ये कहता है हंस कर |
    राम राम कि बेला में,
    देखो बैठा है फिर पीकर |

    -मस्त!! :)

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद्

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  3. अजीब पागल हो भाई.
    खोपड़ी घूम गयी मेरी.
    बप्पा रे !!!

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  4. सोचा था टिप्पणी दे दूं लेकिन नहीं दूंगा.
    :)

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  5. kya baat kahi...

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