Wednesday, February 3, 2010

वो पौध घर के साथ हमने ही लगायी थी |

एक पेड़ के छांया ने,
फिर हमको पनाह दी,
जिस पेड़ के जड़ ने,
मेरी दिवार ढाई थी |

टुटा जो मेरा आसियाँ,
गलती न थी उसकी,
वो पौध घर के साथ,
हमने ही लगायी थी |

मुस्कुरा  के जी सकूँ,
इतनी से चाह ले |
आ गया सब छोड़ कर,
इसकी पनाह में | 

सिकवा गिला नहीं,
न कोई रंजिसे बाक़ी,
सुरुवात नयी ज़िन्दगी कि,
फिर  करने यहाँ से |

जो बुरा था बीत गया,
बस इस ख्याल से |
आ गया आनंद यहाँ, 
फिर मिलने जहाँ से |
 

3 comments:

  1. bahut bahut dhanyawad Samir ji
    aapka ashirwad pana mere liye bahut badi uplabdhi hai..
    aage bhi mujhe aapke comment ka intjar rahega

    Tapashwani K Anand

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  2. हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

    Sanjay kumar
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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