Sunday, April 25, 2010

कुछ अधूरे पन्ने

1: 
चैन से सोते थे हम,
जब घर में दरवाज़ा ना था |
जब से पहरेदार रखे,
नींद भी आती नहीं |

2: 


देख  कर  उनको  कदम ,
रुकने  लगें  क्या बात  है |
सोचने  को  हैं  विवश,
क्या  यार  तुममे  खास  है |
दर्जनों गलियां  बदल  ली,
यार  फिर भी  क्या  मिला |..
हर  गली  हर  मोड़  पर,
बस  तेरा  ही  आभास   है |

3:
दिल कि बातें अब जुबां पर ,
उस तरह आती नहीं |
अनगिनत चहरे बदल लेता हूँ,
मैं हर मोड़ पर |
पहले दिल कि बात कागज़ पर,
छपा करती थी सीधे |
अब तो सीधे राह  से,
जाने कब गुजरे कलम |

४:
राह पर मेरे लिए,
कुछ फूल कुछ काटें भी थे |
आदमी के भीड़ में,
कुछ शोर सन्नाटे भी थे |
बात किस्मत कि ना थी,
थी बात रिश्तों कि यहाँ |
कुछ मिले काटें अगर,
कुछ हमने भी बांटे तो थे |
संग मेरे जो घटा,
दिल खोल के अपना लिया |
राह में गर कुछ लुटा ,
कुछ हमने भी नोचें ही थे |

6 comments:

  1. बहुत बढिया छंद हैं....बहुत सुन्दर लिखे हैं बधाई स्वीकारें।

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  2. उम्दा सोच पर आधारित प्रस्तुती के लिए धन्यवाद / ऐसे ही सोच की आज देश को जरूरत है / आप ब्लॉग को एक समानांतर मिडिया के रूप में स्थापित करने में अपनी उम्दा सोच और सार्थकता का प्रयोग हमेशा करते रहेंगे,ऐसी हमारी आशा है / आप निचे दिए पोस्ट के पते पर जाकर, १०० शब्दों में देश हित में अपने विचार कृपा कर जरूर व्यक्त करें /उम्दा विचारों को सम्मानित करने की भी व्यवस्था है /
    http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html

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  3. बहुत सुंदर । कुछ टायपिंग की गलतियां रह गई हैं, जैसे आभास हो आभाष नही और लुटा हो लूटा नही । सीधे राह से न कि रह से । इससे कुछ खरखरी सी लगती है । आप नाराज न हों ।

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  4. बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
    बहुत देर से पहुँच पाया.......माफी चाहता हूँ..

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  5. @Asha Ma'am: Age dhyan rakhunga..
    Please keep blessing.

    @ Bhaskar. thanx brother.

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