Friday, December 17, 2010

पिघल रहा वो चन्दन सा तन

अपना तो मैं भूल चूका हूँ ,
बस तेरी यादें बाकि है |
भूली बिसरी शरद में लिपटी,
तेरी अह्सासें बाकि है |
याद ना हो तुझको शायद ,
तेरी यौवन का अल्हड़पन |
तेरी हर एक कमर के बल पर ,
वर्षों से रूहें  घायल है | 
बारिस  कि बूँदों से घायल,
पिघल रहा वो चन्दन सा तन |
तेरी साँसों कि गर्मी  से,
अब भी मेरी रातें पागल है |
माना याद नहीं तुमको कुछ,
ख़त, दस्तखत, वादें , यादें तक |
पर तेरी दांतों के बल पर,
मेरी जस्बातें घायल है | 
बारिस  कि बूँदों से घायल,
पिघल रहा वो चन्दन सा तन |
भूली बिसरी शरद में लिपटी,
तेरी अह्सासें बाकि है |

6 comments:

  1. यादों की सुब्दर तस्वीर पेश की है। बधाई।

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  3. Are bhai khatarnak..jabardast...fadu...etc etc
    Bhai tu 1 book hi likh dal....Aur pahli copy mujhe diyo autograph k sath.. :)

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  4. Thanks Shishal bhai !!
    Bilkul kyun nahi..

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  5. oye bhai apni book kab publish karwa raha hai.....

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