Friday, August 11, 2017

परिवर्तन

जीत में उन्माद है तो,
हार में अवसाद होगा।
इस धरा पर, मित्र मेरे,
कुछ भी स्थायी नही है ।।

कुछ पाने पर, गर जस्न है,
तो खोने का भी शोक होगा ।
कोई भी व्यवहार आनंद,
फिर चीर-स्थायी नही है ।।

Friday, July 7, 2017

झील सी आँखे

थीं कुछ की आँखे झील,
तो कुछ रूप रंग में आगे थीं |
थें कुछ कातिल नयन नक्स,
कुछ हिरनी सी बाल खातीं थी ।
कुछ के दांतो के कायल थे,
कुछ के बालों पर मरतें थें
कैसे बयाँ करें तुमसे ,
हम किस चेहरे पर मरतेँ थे ।😄




Friday, March 3, 2017

एक पिता है वो

जो भूल कर, खुलकर कभी भी नहीं हँसता,
वो डरता है, बच्चे भटक जाएँ नहीं  रस्ता ।
जो माँ से मिलकर, प्यार अपना भी लूटाता,
वो बाप है, ख़ुद को लुटा के घर बनाता है ।

दुख का हर तूफ़ान, ख़ुद पर झेलता है जो,
मुश्किलों के साथ, हरदम खेलता है वो ।
दर्द सब सहकर, हमेशा मुस्कुरा ले जो ।
कुछ ना पूछो, जान लो कि एक पिता है वो !

Tuesday, January 3, 2017

मैं राम नहीं ...

मैं राम नहीं, न सही, लेकिन,
तुम जाने क्यूँ सीता लगती हो ।
तुम भाँग के गोले जैसी हो,
समय के संग ज्यादा चढ़ती हो ।

वैसे तो आनंद देखेँ है,
कई उर्वशी, रंभा तक भी ।
पर जाने क्या खूबी है तुममे,
बस तुम ही, मुझको जंचती हो।

उद्देश्य है क्या ?

सोच समझ, करे बस प्रपंच,
बस सोचूं, कुछ कर पाऊँ ना । 
जानू अंतर, क्या पाप पुण्य
फिर भी  खुद को समझाऊं ना ।। 

काम क्रोध, मद लोभ, शत्रु हैं,
ये मुझे पता है बचपन से । 
करके देखें लाख जतन,
पर विजय न पाया इस मन पे ।। 

इच्छा है सब कुछ पाने की,
हर दिल में बस छा जाने की । 
पर राह कौन सी चुनु यहाँ,
जिसमे क्षमता बढ़ते जाने की  ॥

क्यों हुआ जन्म इस धरती पर,
ना जानू  मैं उद्देश्य है क्या । 
बस भटक रहा हूँ, आस लिए,
मंजिल तक एक दिन पहुँचूँगा ।।