Friday, July 7, 2017

बस तुम

मैं राम नहीं, न सही, लेकिन,
तुम जाने क्यूँ सीता लगती हो ।
तुम भाँग के गोले जैसी हो,
समय के संग ज्यादा चढ़ती हो ।

वैसे तो आनंद देखेँ है,
कई उर्वशी, रंभा तक भी ।
पर जाने क्या खूबी है तुममे,
बस तुम ही मुझको जंचती हो।

झील सी आँखे

थीं कुछ की आँखे झील,
तो कुछ रूप रंग में आगे थीं |
थें कुछ कातिल नयन नक्स,
कुछ हिरनी सी बाल खातीं थी ।
कुछ के दांतो के कायल थे,
कुछ के बालों पर मरतें थें
कैसे बयाँ करें तुमसे ,
हम किस चेहरे पर मरतेँ थे ।😄




Friday, March 3, 2017

एक पिता है वो

जो भूल कर, खुलकर कभी भी नहीं हँसता,
वो डरता है, बच्चे भटक जाएँ नहीं  रस्ता ।
जो माँ से मिलकर, प्यार अपना भी लूटाता,
वो बाप है, ख़ुद को लुटा के घर बनाता है ।

दुख का हर तूफ़ान, ख़ुद पर झेलता है जो,
मुश्किलों के साथ, हरदम खेलता है वो ।
दर्द सब सहकर, हमेशा मुस्कुरा ले जो ।
कुछ ना पूछो, जान लो कि एक पिता है वो !

Tuesday, January 3, 2017

मैं राम नहीं ...

मैं राम नहीं, न सही, लेकिन,
तुम जाने क्यूँ सीता लगती हो ।
तुम भाँग के गोले जैसी हो,
समय के संग ज्यादा चढ़ती हो ।

वैसे तो आनंद देखेँ है,
कई उर्वशी, रंभा तक भी ।
पर जाने क्या खूबी है तुममे,
बस तुम ही, मुझको जंचती हो।

उद्देश्य है क्या ?

सोच समझ, करे बस प्रपंच,
बस सोचूं, कुछ कर पाऊँ ना । 
जानू अंतर, क्या पाप पुण्य
फिर भी  खुद को समझाऊं ना ।। 

काम क्रोध, मद लोभ, शत्रु हैं,
ये मुझे पता है बचपन से । 
करके देखें लाख जतन,
पर विजय न पाया इस मन पे ।। 

इच्छा है सब कुछ पाने की,
हर दिल में बस छा जाने की । 
पर राह कौन सी चुनु यहाँ,
जिसमे क्षमता बढ़ते जाने की  ॥

क्यों हुआ जन्म इस धरती पर,
ना जानू  मैं उद्देश्य है क्या । 
बस भटक रहा हूँ, आस लिए,
मंजिल तक एक दिन पहुँचूँगा ।। 

Monday, November 14, 2016

लगे हुए हैं लाइन में ।

छुपे हुए हैं घर के अंदर, 
कितने बड़े बड़े शातिर ,
हम लगे हुए हैं लाइन में, 
सौ सौ के छुट्टो के खातिर । 

दो दिन धक्का मुक्की करके, 
कुछ भी हिला नहीं पाया,
नए नए नोटों  का पत्ता, 
अब तक हाँथ नहीं आया । 

सुना है आकर्षण है भईया, 
नए नोट के साइन में ,
सो काम धाम सब भूल भाल कर, 
हम लगे हुए हैं लाइन में । 

Wednesday, June 24, 2015

मैं कस्तूरी ढूंढ़ रहा हूँ..

ढूंढ रहा हूँ व्याकुल होकर,
कुछ तो खाली खाली सा है।
पता नहीं क्यों लगे अधूरा,
क्यूँ मन बिन पानी, मछली सा है ।

चाह नहीं अम्बर छूने की,
ना धरती पर, पग धरने की।
ना कोई ख्वाहिस् जीने की,
और ना ही इच्छा मरने की ।

ना मैं योगी, ना मैं भोगी,
न जाने किस ओर चला हूँ ।
आनंद हूँ, आनंद पाने को,
मृग बन, कस्तूरी ढूंढ़ रहा हूँ

Friday, May 1, 2015

थोड़ा वक़्त तो लगता है ।

हवा सदा अनुकूल चले, बस ऐसा कम ही होता है,
अनचाहा परिवर्तन अक्सर , थोड़ा दर्द तो देता है। 
थको नहीं तुम, बढ़ो निरंतर, अपनी मंजिल पाने को,
पतझड़ से कोंपल आने तक, थोड़ा वक़्त तो लगता है । 

चाल समय की  सदा सर्वदा, परिवर्तित हो जाती है,
ज्वलन सुबह के बाद सही, एक निर्मल रात भी आती है। 
सतत परिश्रम करते जाओ, बढ़ते जाओ मंज़िल तक,
फिर थक कर, बेसुध गिरने से, थोड़ा आराम तो मिलता है ।

Friday, January 9, 2015

घनघोर अँधेरा


जाने क्यों हर बात पर, चिढ़ने लगा हूँ मै,
जाने क्यूँ लगता है सब, मेरे विरुद्ध हैं । 
हर रास्ते में भय का, है घनघोर अँधेरा,
जिस रोशनी की आस थी, जाने वो किधर है। 

हाँथ आ जाने का भरम,  कुछ देर से टुटा,
मेरा नहीं था जो कभी, उसका गुमान क्यों। 
मुद्दत से समेटा है, खुद को सबके दरमियाँ,
मैं फूट न जाऊं कहीं, इस बात का डर है  । 

Thursday, December 25, 2014

ठंडी और मित्र

बड़ी ही बेरूखी से सब,
हैं बैठे बस रजाई में ।
न कोई ख़त, न कोई खैर,
हैं बस, दुबके चटाई में ।

अगर अब भी न आया होश,
सुन आनंद की बातें ।
कि कोई फेंक दे पानी,
वहाँ जा कर रजाई में ।

लगेगी ठण्ड जब चुभने,
सुई की भाँति रग रग में,
फिर मत आना सुनाने हाल,
फिर इस गर्म कमरे में ।