Friday, May 1, 2015

थोड़ा वक़्त तो लगता है ।

हवा सदा अनुकूल चले, बस ऐसा कम ही होता है,
अनचाहा परिवर्तन अक्सर , थोड़ा दर्द तो देता है। 
थको नहीं तुम, बढ़ो निरंतर, अपनी मंजिल पाने को,
पतझड़ से कोंपल आने तक, थोड़ा वक़्त तो लगता है । 

चाल समय की  सदा सर्वदा, परिवर्तित हो जाती है,
ज्वलन सुबह के बाद सही, एक निर्मल रात भी आती है। 
सतत परिश्रम करते जाओ, बढ़ते जाओ मंज़िल तक,
फिर थक कर, बेसुध गिरने से, थोड़ा आराम तो मिलता है ।

Friday, January 9, 2015

घनघोर अँधेरा


जाने क्यों हर बात पर, चिढ़ने लगा हूँ मै,
जाने क्यूँ लगता है सब, मेरे विरुद्ध हैं । 
हर रास्ते में भय का, है घनघोर अँधेरा,
जिस रोशनी की आस थी, जाने वो किधर है। 

हाँथ आ जाने का भरम,  कुछ देर से टुटा,
मेरा नहीं था जो कभी, उसका गुमान क्यों। 
मुद्दत से समेटा है, खुद को सबके दरमियाँ,
मैं फूट न जाऊं कहीं, इस बात का डर है  । 

Thursday, December 25, 2014

ठंडी और मित्र

बड़ी ही बेरूखी से सब,
हैं बैठे बस रजाई में ।
न कोई ख़त, न कोई खैर,
हैं बस, दुबके चटाई में ।

अगर अब भी न आया होश,
सुन आनंद की बातें ।
कि कोई फेंक दे पानी,
वहाँ जा कर रजाई में ।

लगेगी ठण्ड जब चुभने,
सुई की भाँति रग रग में,
फिर मत आना सुनाने हाल,
फिर इस गर्म कमरे में ।

Sunday, November 9, 2014

मेरा गुल्लख

जब दर्द छुपा न पाया तब,
बरबस मेरा गुल्लख बोल पड़ा ।
दम घुटता है अंधियारे में,
ये कहते हिम्मत छोड़ गया ।

जो व्यथा सुनाई गुल्लख ने,
सुनते ही आँखें भर आई ।
जो चिंतित है मेरी खातिर,
क्यूँ मिली उसे फिर तनहाई ।

गुल्लख.....
क्यों छुपा के कोने रख्खा है ।
मुझको छोडो अब जाने दो।
महंगाई की मार बहुत है,
अब यूँ ना मुझको ताने दो ।

छुटकी बिटिया चिल्लर के संग,
अपने सब सपने रखती है ।
जोभी दिल में होता है,
दिल खोल, मुझी से कहती है ।

पिन, चाकू, छुरी चम्मच,
हर मार सही,  बिन बोले ही।
दुनियां की बात नहीं आनंद,
सब जख्म मिलें हैं अपने ही ।

चाहे खाएँ हो लाख जख्म,
पर खुला नहीं मैं गैरों से।
जब तक हिम्मत थी मुझमे,
मैं डटा रहा हर पहरों में ।

बिटिया की इच्छाओं से,
अब बरबस ही डर लगता है।
जो सोच रही है मन में ही,
मेरे संग मेरा गुल्लख रक्खा है ।

मैं कैसे कहूँ, उसे की मैं,
एक आदत हूँ, उपचार नहीं ।
मैं संरक्षण सिखलाता हूँ,
मैं कोई कोषागार नहीं ।

मैं तुम्हे सिखा सकता हूँ,
कैसे संचित करें धरोहर को,
पर तुम्हे बचा न पाउँगा,
मैं कोई, गड़ा भण्डार नहीं।

जब दर्द छुपा न पाया तब,
बरबस मेरा गुल्लख बोल पड़ा ।
अब दम घुटता, अंधियारे में,
ये कहते हिम्मत छोड़ गया ।

Monday, October 13, 2014

थोडा गुरुर रहने दे

सुरूर तुझको है, तू रख उसे करीने से,
थोड़ा गुरुर मुझमे है, उसे भी रहने दे  । 

मैं जैसा हूँ, मुझे वैसा ही रहने दे आनन्द,
मौत के बाद तो, हम सबको खाक होना है ।

तुझे गर फ़िक्र है दुनियां कि, ये भी बेहतर है,
मुझे फिर खुद में ही, थोड़ा सुमार रहने दे  ।

तुझे कुछ इल्म है, दुनियां की हक़ीक़त अगर,
मुझे जाहिल, थोड़ा अनपढ़, गँवार रहने दे ।

मोहोब्बत  का फरिश्ता तू, मिटा नफरत,
मुझे  तू प्यार का दुश्मन समझ, और बहने दे ।

सुरूर तुझको है, तू रख उसे करीने से,
थोड़ा गुरुर मुझमे है, उसे भी रहने दे  । 



Wednesday, October 1, 2014

सामने आया न करो ।

तुम्हे मगरूर कह कह के,
बनाई है दुकाँ हमने,
फिर तुम यूँ मासूम सी,
दुनियां को न दिख जाया करो । 

बिना कहे ही सौ नक़ाब,
भिजवाया था तुम्हे । 
बिना नक़ाब के,
फिर तुम सामने आया न करो । 

Tuesday, September 23, 2014

जुड़ जाने का दिल करता है...

अच्छा लगता है, जब अपने,
उमड़ घुमड़ आ जातें है । 
छोटे सपने, बड़ी उम्मीदे,
बिन चाहे, घिर जातें है । 

उठा-पटक, धींगा-मस्ती,
हम जिन संग किये न थकते थे । 
बड़ा अटपटा लगता है,
जब वो ही सीधे हो जातें है । 

तोड़ के सारे बंधन,
फिर जुड़ जाने का दिल करता है । 
छोटी जिद्द और बड़ी शरारत,
दिल दोहराने को करता है । 

हर मोड़ पर दिल का खोना,
रोते रोते, दिन भर सोना । 
वो ख्वाबों में खो जाना,
और फिर ढूढ़ें नया बहाना । 

वो पैदल पैदल, कर करतल,
कुछ गलियों में गुम हो जाना । 
और शाम होते ही बरबस, 
अच्छा बच्चा बन घर आ जाना । 

अच्छा लगता है, जब अपने,
उमड़ घुमड़ आ जातें है । 
छोटे सपने,,………। 

Dedicated to all R.K I.C friends....


Saturday, August 30, 2014

ऐ ज़िन्दगी

ऐ ज़िन्दगी,
लगा हुआ हूँ समझने, तुझे मैं वर्षों से,
और एक तू है जो हरपल ही बदल जाती है ।
यूँ तो बदनाम है, झुरमुठ का पुराना गिरगिट,
पर कितने रंग तू , बस यूँ ही बदल जाती है ।

न कोई ग़म, न रहम, तेरा किसी पर भी ।
तेरी तर्कस के , हर एक तीर तू चलाती है ।
यूँ तो बदनाम है, अदनी सी चिंगारी और हवा,
तू सोच, पल में कितने घर, तू जला जाती है ।

Sunday, November 17, 2013

हिमालय जैसे दिखते बाबूजी ...

Dedicated to Pitaji, :)

I tried several times to tell him that I love him very much and I can not imagine myself without his warm support and guidance.

I don't know why, but failed to express my love and care each time, so writing below lines for my role model my hero 'PITAJI'.

I love you PITAJI.

माँ दरिया सी सरल, हिमालय जैसे दिखते बाबूजी,
न्यौछावर ममता निर्झर, तो उधर भाव सब काबू भी । । 

माँ दरिया सी सरल, हिमालय जैसे दिखते बाबूजी  ……… 

अम्मा कि थपकी सुकून, थप्पड़ सुबूत है बाबूजी, 
जब माँ के मीठे बोल ढील दें, दें ठुमकी साधें बाबूजी । । 

माँ दरिया सी सरल, हिमालय जैसे दिखते बाबूजी  ……… 

माँ कुम्हार के नरम हाँथ, और जलती भट्टी बाबूजी, 
माँ मुझको देतीं हैं आकार , पर यार पकाते बाबूजी । । 

माँ दरिया सी सरल, हिमालय जैसे दिखते बाबूजी  ……… 

माँ हिंदी कि सरल विधा, संस्कृत से क्लिष्ट हैं बाबूजी,
माँ सुरताल भरी कविता, और वयंग बांड से बाबूजी ॥ 

माँ दरिया सी सरल, हिमालय जैसे दिखते बाबूजी ……… 

माँ के सारे भाव प्रकट, पर हर भाव छुपाते बाबूजी, 
माँ धरती की नरम घाँस , और घने वृक्ष हैं बाबूजी ॥ 

माँ दरिया सी सरल, हिमालय जैसे दिखते बाबूजी  ……… 

Tuesday, September 3, 2013

चमकना चाहता हूँ

मैं पत्थर हु जो हीरे सा चमकना चाहता है,
मै लोहा हूँ जो सोने सा दमकना चाहता है । 
मुझे मालूम है, मेरा मुक्कदर भी लिखा है पर,
मैं परवाना हु जो दिपक से लड़ना चाहता हूँ । 

By : तपश्वनी कुमार आनन्द