मन में झांके हर किसी के,
यार ये मुमकिन ना था |
तन से जो सुन्दर लगा,
हम यार उसके हो लिए |
एक घडी में हर किसी को,
जान ले मुमकिन ना था |
एक नजर में जो जँचा'
हम यार उसके हो लिए |
वो जो प्यार का था रास्ता,
मेरे लिए तो नया ही था |
चले डगमगा के जिधर कदम
मैं उसी लगी में निकल गया |
संग कारवां का साथ हो,
ये चाह तो बचपन से थी |
फिर भीड़ जो अच्छी लगी,
मैं यार उसमे खो लिया |
Friday, March 26, 2010
Sunday, March 7, 2010
हमको कोई खतरा नहीं??????
गंध बारूदों कि अब,
आने लगी हर मोड़ से |
कह रहा है हर कोई,
हमको कोई खतरा नहीं |
यहाँ धर्म भाषा जाति कि,
चिन्गारियाँ बिखरी हुई |
पर कह रहा है हर कोई |
मुझको कोई खतरा नहीं |
अब पडोसी तक दखल,
देता है हर एक बात में |
पर कह रहा है रहनुमा,
उनसे कोई खतरा नहीं |
है लचर अपनी व्यवस्था,
ये जानता है हर कोई |
पर दिलासा दे रहा है,
हमको कोई खतरा नहीं |
है समय अब भी,
सुधर जाएँ अगर तो ठीक है |
बाद में कह ना सकेंगे,
हमको कोई खतरा नहीं.|
Friday, February 26, 2010
पिताजी के आँखों से बनारस कि सैर
वैभव नाथ शर्मा जी के आँखों से बनारस देख कर मुझे अपने पिताजी कि कुछ पंक्तियाँ याद आ गयी | पिताजी के सामने मेरी बिसात कुछ भी नहीं है एक अदना सा प्रयास पिताजी के भावों और जस्बातों को अपने ब्लॉग पर उड़ेलने कि | आईये पिताजी के नज़रों से आप सभी को बनारस कि सैर करता हूँ | काशी से दूर रहने का दर्द और काशी के वाशी होने का गर्व अगर आप तक पहुंचे तो मैं समझूंगा कि मेरा प्रयास सार्थक हुआ |अगर बनारस का पूरा रस आप तक पहुचे तो सूचित करें मुझे आप सभी के मत का इंतजार रहेगा |
काशी के वासी रहें, हम हो गए अनाथ,
गंगा मैया छुट गयीं, छुटे भोले नाथ |
काशी के ढ़ग छुट गए,चाई मुग़ल सरायं
काशी के ढ़ग छुट गए,चाई मुग़ल सरायं
जरा ध्यान दे जेब पर माल हजम कर जाए |
रांड सांड सीढ़ी छुटल, सन्यासी सतसंग,
गली घाट सब छुट गयल, होए गए मतिमंद |
पंडा के छतरी छुटल, गंगा जी के नीर,
चना चबैना भी छुटल, फूट गयल तक़दीर |
बालू के रेता छुटल, और नैया के सैर,
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर |
आय बसें परदेश में, चिकना होगया चाँद,
लडकन के महकै लगल, घर बर्धन के नाद |
ना केहू के खबर बा, ना केहू के हाल,
सोचत सोचत रात दिन हो जाए बेहाल |
बस अपनी इतनी कथा, और नहीं कुछ शेष,
थोडा सा रखना दया हम पर भी अखिलेश |
पहिया चलता समय का, हो जाता सब शेष,
चोपन में परवास दुख भोग रहें अखिलेश |
Sunday, February 21, 2010
कितनी दूर निकल आया ?
पाँव जमीं पर रख करके,
कल ही तो चलना सीखा था |
नन्हे नन्हे कदमो से मै,
कितनी दूर निकल आया |
गुड्डे गुड़ियों के किस्से,
मानो कल कि ही बातें थी,
मै अपनो के दामन से,
ये कितनी दूर निकल आया |
नींद नहीं आती थी मुझको,
माँ कि लोरी सुने बिना |
बाबुल कि उंगली पकडे,
मैं कितनी दूर निकल आया |
कदर न थी तब तक कोई,
जब तक मांगे मिल जाता था |
आज ये जाना अपनो को तज,
मैं कितनी दूर निकल आया |
कल मेरी ये राहें शायद,
सबसे अलग हो जाएँगी |
मैं अपने सपनो के पीछे,
मीलों दूर निकल आया |
Thursday, February 11, 2010
तेरे इस बाज़ार में मौला
तेरे इस बाज़ार में मौला,
बस चिकनी चीजे बिकती है |
मन चंचल हो जाये जिससे,
बस वो सूरत ही दिखती है |
यहाँ बेच रहा है हर कोई,
अब तेरे मेरे सपनों को |
हो सौदा यहाँ मुनाफे का,
फिर वस्तु चाहे जैसी हो |
विज्ञापन से आज यहाँ,
सब मुमकिन हो जाता है|
जब बोतल में नल का पानी,
यहाँ गंगा जल बन जाता है|
नामुमकिन सा काम यहाँ,
आकर मुमकिन हो जाता है |
फटा पुराना कपडा भी अब,
लाखों में बिक जाता है |
हर गली में हर चौबारे पर,
ना जाने क्या चुभ जाता है |
तेरे इस बाज़ार में मौला,
जब इज्ज़त बिक जाता है |
तेरे इस बाज़ार में मौला,
बस चिकनी चीजे बिकती है |
मन चंचल हो जाये जिससे,
बस वो सूरत ही दिखती है |
बस चिकनी चीजे बिकती है |
मन चंचल हो जाये जिससे,
बस वो सूरत ही दिखती है |
यहाँ बेच रहा है हर कोई,
अब तेरे मेरे सपनों को |
हो सौदा यहाँ मुनाफे का,
फिर वस्तु चाहे जैसी हो |
विज्ञापन से आज यहाँ,
सब मुमकिन हो जाता है|
जब बोतल में नल का पानी,
यहाँ गंगा जल बन जाता है|
नामुमकिन सा काम यहाँ,
आकर मुमकिन हो जाता है |
फटा पुराना कपडा भी अब,
लाखों में बिक जाता है |
हर गली में हर चौबारे पर,
ना जाने क्या चुभ जाता है |
तेरे इस बाज़ार में मौला,
जब इज्ज़त बिक जाता है |
तेरे इस बाज़ार में मौला,
बस चिकनी चीजे बिकती है |
मन चंचल हो जाये जिससे,
बस वो सूरत ही दिखती है |
Sunday, February 7, 2010
कैसे लिखूं और क्या लिखूं
कैसे लिखूं और क्या लिखू,
ये कौन बतलाता मुझे |
सोच में है क्या कमी,
ये कौन समझता मुझे
दोस्त दुश्मन और खुद मै,
खुद से इतना दूर था |
जो लिख रहा हूँ वो सही है|
कैसे समझ आता मुझे |
कहने को तो मौके कई,
आए स्वतः ही सामने |
अहमियत हर बात कि,
फिर कौन समझाता मुझे |
बात पूरी या अधूरी,
जो समझ आती गयी |
आंख मुदे फिर कलम,
बिन बात लहराती रही |
कैसे लिखूं और क्या लिखूं
ये कौन बतलाता मुझे |
सोच में है क्या कमी,
ये कौन समझाता मुझे |
ये कौन बतलाता मुझे |
सोच में है क्या कमी,
ये कौन समझता मुझे
दोस्त दुश्मन और खुद मै,
खुद से इतना दूर था |
जो लिख रहा हूँ वो सही है|
कैसे समझ आता मुझे |
कहने को तो मौके कई,
आए स्वतः ही सामने |
अहमियत हर बात कि,
फिर कौन समझाता मुझे |
बात पूरी या अधूरी,
जो समझ आती गयी |
आंख मुदे फिर कलम,
बिन बात लहराती रही |
कैसे लिखूं और क्या लिखूं
ये कौन बतलाता मुझे |
सोच में है क्या कमी,
ये कौन समझाता मुझे |
Wednesday, February 3, 2010
वो पौध घर के साथ हमने ही लगायी थी |
एक पेड़ के छांया ने,
फिर हमको पनाह दी,
जिस पेड़ के जड़ ने,
मेरी दिवार ढाई थी |
फिर हमको पनाह दी,
जिस पेड़ के जड़ ने,
मेरी दिवार ढाई थी |
टुटा जो मेरा आसियाँ,
गलती न थी उसकी,
वो पौध घर के साथ,
हमने ही लगायी थी |
गलती न थी उसकी,
वो पौध घर के साथ,
हमने ही लगायी थी |
मुस्कुरा के जी सकूँ,
इतनी से चाह ले |
आ गया सब छोड़ कर,
इतनी से चाह ले |
आ गया सब छोड़ कर,
इसकी पनाह में |
सिकवा गिला नहीं,
न कोई रंजिसे बाक़ी,
सुरुवात नयी ज़िन्दगी कि,
फिर करने यहाँ से |
जो बुरा था बीत गया,
बस इस ख्याल से |
आ गया आनंद यहाँ,
न कोई रंजिसे बाक़ी,
सुरुवात नयी ज़िन्दगी कि,
फिर करने यहाँ से |
जो बुरा था बीत गया,
बस इस ख्याल से |
आ गया आनंद यहाँ,
फिर मिलने जहाँ से |
Wednesday, January 27, 2010
बाँट लो अपना घरौंदा
फायदा क्या साथ रहने में,
यहाँ फिर बे-सबब |
जब लगे बर्तन खनकने,
यार हो जाओ अलग |
जब सिर्फ अपनी बात ही,
सबको सही लगने लगे|
बाँट लो अपना घरौंदा,
ताकि हंस कर मिल सके |
बात एक दूजे कि जब,
कान में चुभने लगे,
मौन ब्रत धर लो वहां,
ताकि सुकून से रह सको|
जब हुआ हर काम ,
अपना ही किया लगने लगे |
और रिश्ते खुद पर तुझको,
बोझ से लगने लगे |
जब लगे है फायदा,
दूर रहने में तुम्हे |
तब तोड़ दो एक घर कि ,
फिर दो घर ख़ुशी से रह सके |
Friday, January 8, 2010
ये गहरी खाइयाँ क्यूँ है |
ख़ुशी के समन्दर में,
ये गम के बुलबुले क्यूँ है |
अपनों के इस भीड़ में,
हम यहाँ तन्हा क्यूँ है|
यूँ तो सूरज रोज आता है,
मेरे दर पर हर सुबह|
फिर भी मेरे दर पर,
ये घोर अँधेरा क्यूँ है |
साथ चलने से यूँ तो,
मिटा करती थी दूरियां |
फिर ये हम दम से,
ये इतना फांसला क्यूँ है |
मिलने कि है आरजू,
कई मुद्दत से सनम |
दिलों के बिच में अब तक,
ये गहरी खाइयाँ क्यूँ है |
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