Friday, January 4, 2013

दीपक जलना चाहता हूँ ।

सूर्य को आकाश से,  
पृथ्वी पर लाना चाहता हूँ ।
मैं धरा से तम का सारा, 
भय मिटाना चाहता हूँ ।।

मैं चाहता हूँ मुक्त हो,
अब रोशनी की हर किरण ।
बस इसलिए  तूफान में,
दीपक जलाना चाहता हूँ ।

लकड़ियाँ गीली हैं सत्ता की,
ये मैं भी जनता हूँ ।
सो जिद्द की खुरचन से, 
झूठ का, महल जलाना चाहता हूँ ।

जानता हूँ, वो निघर्घट,
बेशरम है रहनुमा पर ।
मैं जिद्द के ढेले से किले को,
ध्वस्त करना चाहता हूँ ।

मैं चाहता हूँ मुक्त हो,
अब रोशनी की हर किरण ।
बस इसलिए  तूफान में,
दीपक जलना चाहता हूँ ।

Friday, September 21, 2012

तेरी तलाश में

कहने को चार दिन कि थी, ये ज़िन्दगी अपनी |
शदियों गुजर गएँ , एक तेरे इंतजार में |
कहतें थें  जमी गोल है, टकरायेंगे एक दिन,
तब से सफ़र में हूँ, मैं बस तेरी तलाश में |

Sunday, August 12, 2012

बचपन Part1

बड़े सपनों की जब औकात थी,
गुल्लख से नपने की,
सुनाऊंगा तुम्हे मैं बात,
कुछ अपने ही बचपन की |

जब सिक्का एक का,

पड़ता था दस के नोट पर भारी |
खनक गुल्लख की लाती थी,जब एक मुस्कान फिर प्यारी |......... 

धनुष ले  हाँथ में,
एक पल में यारों राम बन जातें |
कभी घुटनों पर जा बैठें,
और हम रहमान बन जातें |


धर्म और जात का अंतर,
जब हमको पता ना था |
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा भी,
सब एक  जैसा ही  था |


कई किरदार थे अन्दर,
जो बहार आ ही जाते थे |
कभी चड्ढी पहन के मोगली,
कभी घुमे गोल और शक्तिमान बन जातें |


घूम्चियों के बीज जब.
मोती से सुन्दर थे |
बड़े ही चाव से हम,
फिर घुम्चियाँ धागों में बुनते थे |


मिटटी खोद कर जब, 

केचुए, हांथों से चुनते थे |
चारा मिल गया ये सोचकर,
दिल खोल हँसते थे |

कांटा चार आने का,

फंसाकर अपनी  बंसी में |
निकल  पडतें थे नंगे पांव,
घर में शार्क लेन को ||| 

जारी..

Saturday, April 21, 2012

तू जब तक दूर थी ..


तू जब तक दूर थी, तेरी कमी हर पल अखरती थी,
तेर संग जीने मरने कि, बड़ी ख्वाहिस उमड़ती थी |
मैं हर पल ढूंढता था अक्स तेरा हर किसी में पर,
थे  बीतें साल कितने ही, कोई तुझसी  न दिखती थी |

To be continued..       By Tapashwani Anand

Saturday, August 6, 2011

मैं नंगे पग चलना चाहूँ |

रिश्तों कि डोरी पकडे मैं,  कुछ और दूर चलना चाहूँ,
लुक्का छुप्पी कर उलझन से, बचपन में जीना चाहूँ |
 छूट गया जो वर्षों पहले, बचपन के चौराहों पर तब,
उसी पुराने सकरे पग पर, मैं नंगे पग चलना चाहूँ  |
माना थका नहीं हूँ अब भी मैं, हंसी, ठिठोली, बोली से पर,
अम्मा कि आँचल  में छुप कर, फिर  बच्चों सा रोना चाहूँ |

Sunday, July 3, 2011

पाती

आग कुछ ऐसी लगी,
रिश्तों के खर पतवार में |
ढाई आखर भी नहीं,
कह पाए हम फिर आप से |
वो राह के रिश्ते ना थे,
जो जुड़ गए खुद आप से |
खुद आपने भेजी थी पाती,
दोस्ती के आस से |

Monday, February 7, 2011

आज भी भुला नहीं, कॉलेज में पहला दिन तेरा |

आज भी धुंधले सही,
पर याद हैं कुछ रास्ते |
एक वो है जिस पर घर तेरा,
दूजा जहां देखा तुझे |

सोचा कभी सच बोल दूँ,
सब भेद दिल के खोल दूँ |
पर रुक गएँ पग, जम गएँ लभ |
जब सामने देखा तुझे |

वो झुक के चलने कि अदा,
चेहरे पर  बालों कि घटा |
वो डर से सहमा तन बदन,
कैसे मैं भुलूँ वो दास्ताँ |

ऐसा न कि देखा नहीं,
चंचल बदन, मुख चन्द्रमा |
पर आज भी भुला नहीं,
कॉलेज में पहला दिन तेरा |
 

Friday, December 17, 2010

पिघल रहा वो चन्दन सा तन

अपना तो मैं भूल चूका हूँ ,
बस तेरी यादें बाकि है |
भूली बिसरी शरद में लिपटी,
तेरी अह्सासें बाकि है |
याद ना हो तुझको शायद ,
तेरी यौवन का अल्हड़पन |
तेरी हर एक कमर के बल पर ,
वर्षों से रूहें  घायल है | 
बारिस  कि बूँदों से घायल,
पिघल रहा वो चन्दन सा तन |
तेरी साँसों कि गर्मी  से,
अब भी मेरी रातें पागल है |
माना याद नहीं तुमको कुछ,
ख़त, दस्तखत, वादें , यादें तक |
पर तेरी दांतों के बल पर,
मेरी जस्बातें घायल है | 
बारिस  कि बूँदों से घायल,
पिघल रहा वो चन्दन सा तन |
भूली बिसरी शरद में लिपटी,
तेरी अह्सासें बाकि है |

Saturday, November 27, 2010

याद.........

यकीं तो है कि फिर रंगत चमन कि लौट आएगी,
मगर सब जख्म भर जाए, मुझे मुमकिन नहीं लगता |
तुम्हारी याद दामन में, चिकोटेंगी मुझे जब भी,
तुम्हे मैं भूल पाऊँगा, मुझे मुमकिन नहीं लगता |
बड़ी मुश्किल से तेरी याद को, मैंने किया रुखसत,
मगर तू याद न आए, मुझे मुमकिन नहीं लगता |

Thursday, September 30, 2010

इन्सान बाँट डाला

अब बांटने  का चस्का,
ऐसा लगा आनंद |
घर-बार बाँट  डाला,
और प्यार बाँट डाला |
जो फिर भी सुकूँ ना आया,
तो  संसार बाँट डाला  |
इधर छू कर गयी नहीं,
हवा साजिस लिए कोई |
हमने उधर तपाक से ,
जिस्म रूह बाँट  डाला |
ऊपर है जिसका राज़,
वो सायद जुदा ना हो  |
हमने जिसके नाम पर,
इन्सान बाँट डाला |