Thursday, June 6, 2013

दिल जो छोटा सा है|

ये दिल जो छोटा सा है,
वो इतना फुदकता क्यूँ है । 
खुरदरे राह पर हर वक़्त,
जाने ये फिसलता क्यूँ है । 

षड़यंत्र चौबीसों घंटे,
प्रपंच हर एक पहर ।
जिससे नुकसान हो,
वोही काम ये करता क्यूँ है ।

Wednesday, May 29, 2013

फडफडाना जनता हूँ ।

आंख पर चादर लपेटे, धूप में लेटे हुए,
मैं सूर्य की किरणों से भी पंजा लड़ना जनता हूँ । 
ओस की बूंदों को मसला है कई दिन भोर में,
मैं पंख अपने खोल कर भी फडफडाना जनता हूँ । 

मैं भटक कर राह में, वापस भी आना जनता हूँ,
दिल में रख कर गम, ख़ुशी में मुस्कुराना जनता हूँ । 
मखमली घांसों  की लत अब तक लगी नहीं ,
मैं तो काँटों में भी नंगे पाँव चलना जनता हूँ ।

Saturday, February 16, 2013

बचपन भाग-2

कोई मुझको न समझ ले, तेरा सच्चा आशिक,
स्लेट पे लिख के तेरा नाम, मिटा देता था । 
मुझे मालूम न था, प्यार किसको कहतें थें,
दिल से मजबूर था मैं, बस तुझे ही तकता था । 

मुझमे हिम्मत न थी, इजहारे बयां क्या करता,
ज़िक्र आते ही तेरा, हर घड़ी थम जाती थी । 
मेरे माँ को भी इल्म था, मेरी इस चाहत का,
वो नाम लेके तेरा, मुझको छला करती थी । 

तेरे घर जाने से पहले, संवरना  घंटो तक,
वो आके घन्टों  तेरी याद में डूबे रहना । 
पढ़ा हुआ मैं कभी, भूलता नहीं था मगर,
न जाने क्यूँ तेरे अक्षर ही गढ़ा करता था । 

कोई मुझको न समझ ले, तेरा सच्चा आशिक,
स्लेट पे लिख के तेरा नाम, मिटा देता था ।


Friday, January 4, 2013

दीपक जलना चाहता हूँ ।

सूर्य को आकाश से,  
पृथ्वी पर लाना चाहता हूँ ।
मैं धरा से तम का सारा, 
भय मिटाना चाहता हूँ ।।

मैं चाहता हूँ मुक्त हो,
अब रोशनी की हर किरण ।
बस इसलिए  तूफान में,
दीपक जलाना चाहता हूँ ।

लकड़ियाँ गीली हैं सत्ता की,
ये मैं भी जनता हूँ ।
सो जिद्द की खुरचन से, 
झूठ का, महल जलाना चाहता हूँ ।

जानता हूँ, वो निघर्घट,
बेशरम है रहनुमा पर ।
मैं जिद्द के ढेले से किले को,
ध्वस्त करना चाहता हूँ ।

मैं चाहता हूँ मुक्त हो,
अब रोशनी की हर किरण ।
बस इसलिए  तूफान में,
दीपक जलना चाहता हूँ ।

Friday, September 21, 2012

तेरी तलाश में

कहने को चार दिन कि थी, ये ज़िन्दगी अपनी |
शदियों गुजर गएँ , एक तेरे इंतजार में |
कहतें थें  जमी गोल है, टकरायेंगे एक दिन,
तब से सफ़र में हूँ, मैं बस तेरी तलाश में |

Sunday, August 12, 2012

बचपन Part1

बड़े सपनों की जब औकात थी,
गुल्लख से नपने की,
सुनाऊंगा तुम्हे मैं बात,
कुछ अपने ही बचपन की |

जब सिक्का एक का,

पड़ता था दस के नोट पर भारी |
खनक गुल्लख की लाती थी,जब एक मुस्कान फिर प्यारी |......... 

धनुष ले  हाँथ में,
एक पल में यारों राम बन जातें |
कभी घुटनों पर जा बैठें,
और हम रहमान बन जातें |


धर्म और जात का अंतर,
जब हमको पता ना था |
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा भी,
सब एक  जैसा ही  था |


कई किरदार थे अन्दर,
जो बहार आ ही जाते थे |
कभी चड्ढी पहन के मोगली,
कभी घुमे गोल और शक्तिमान बन जातें |


घूम्चियों के बीज जब.
मोती से सुन्दर थे |
बड़े ही चाव से हम,
फिर घुम्चियाँ धागों में बुनते थे |


मिटटी खोद कर जब, 

केचुए, हांथों से चुनते थे |
चारा मिल गया ये सोचकर,
दिल खोल हँसते थे |

कांटा चार आने का,

फंसाकर अपनी  बंसी में |
निकल  पडतें थे नंगे पांव,
घर में शार्क लेन को ||| 

जारी..

Saturday, April 21, 2012

तू जब तक दूर थी ..


तू जब तक दूर थी, तेरी कमी हर पल अखरती थी,
तेर संग जीने मरने कि, बड़ी ख्वाहिस उमड़ती थी |
मैं हर पल ढूंढता था अक्स तेरा हर किसी में पर,
थे  बीतें साल कितने ही, कोई तुझसी  न दिखती थी |

To be continued..       By Tapashwani Anand

Saturday, August 6, 2011

मैं नंगे पग चलना चाहूँ |

रिश्तों कि डोरी पकडे मैं,  कुछ और दूर चलना चाहूँ,
लुक्का छुप्पी कर उलझन से, बचपन में जीना चाहूँ |
 छूट गया जो वर्षों पहले, बचपन के चौराहों पर तब,
उसी पुराने सकरे पग पर, मैं नंगे पग चलना चाहूँ  |
माना थका नहीं हूँ अब भी मैं, हंसी, ठिठोली, बोली से पर,
अम्मा कि आँचल  में छुप कर, फिर  बच्चों सा रोना चाहूँ |

Sunday, July 3, 2011

पाती

आग कुछ ऐसी लगी,
रिश्तों के खर पतवार में |
ढाई आखर भी नहीं,
कह पाए हम फिर आप से |
वो राह के रिश्ते ना थे,
जो जुड़ गए खुद आप से |
खुद आपने भेजी थी पाती,
दोस्ती के आस से |

Monday, February 7, 2011

आज भी भुला नहीं, कॉलेज में पहला दिन तेरा |

आज भी धुंधले सही,
पर याद हैं कुछ रास्ते |
एक वो है जिस पर घर तेरा,
दूजा जहां देखा तुझे |

सोचा कभी सच बोल दूँ,
सब भेद दिल के खोल दूँ |
पर रुक गएँ पग, जम गएँ लभ |
जब सामने देखा तुझे |

वो झुक के चलने कि अदा,
चेहरे पर  बालों कि घटा |
वो डर से सहमा तन बदन,
कैसे मैं भुलूँ वो दास्ताँ |

ऐसा न कि देखा नहीं,
चंचल बदन, मुख चन्द्रमा |
पर आज भी भुला नहीं,
कॉलेज में पहला दिन तेरा |