Tuesday, January 6, 2009

कब सफल होगी कूटनीति ?

आख़िर कब तक हम देश हित को दूर रखकर इसी प्रकार से सम्मेलन करते रहेंगे | एक महीने से हम उसे सबूत देने मे जुटे हुए है जो खुद आतंकवाद का सरजमीन तैयार करता है | अब तो ये सोच के शर्म आने लगी है कि अपने देश कि बागडोर कैसे नपुंसको के हाथ मे है जो अपने हितो के लिए भी गैर के दरवाजे पर मत्था टेक रहे है | और एक पड़ोसी देश जिसकी खुद मे कुछ औकात नही है वो हमे जबाबी करवाई कि धमकी पर धमकी दिए जा रहा है |आख़िर ये कूटनीति कब तक सफल होगी ?

है राजनीति का ये बिस्तर,
और महल खड़ा है मुद्दों का |
पेट नही भरता मेरा अब,
इस कूटनीति के दावत से ||

आतंकवाद के नाम पर अब,
जितनी चाहो रोटी सेको |
यहाँ गली ना दाल अगर तो,
फिर दुनियाँ मे मत्था टेको ||

अपनी ग़लती उसके सर पर,
वो और किसी पर थोपेगा |
यही चलन है राजनीति का,
जिसने जाना, शुख भोगेगा ||

औकात नही जिसकी खुद मे,
वो भी हमे राह बताएगा |
और चार दीनो कि बात है ये,
फिर सब वैसा हो जाएगा ||

कल का मुद्दा आज अहम है,
आज कि कल फिर देखेंगे |
आतंकवाद कि पृष्ठ भूमि मे,
हम खुद अपना घर फूंकेंगे ||

अपने घर कि रक्षा को,
कब तक घुटनो पर रेंगोगे |
अपनी बात मनाने को,
अब किस दर मत्था टेकोगे ||

Thursday, January 1, 2009

कैसे मनाया नया साल ||

उसने दस्तक दिया मेरे दर पर बहुत ,
फोने कर के मुझे फिर बुलाता रहा ||
पी के सोया था घर मे जो उस रात को ,
बॉस दो रात तक फिर जगाता रहा ||

फ्री कि मुझको मिली और मैं पीता गया,
जाने कब पाँव फिर लड़खड़ाने लगा ||
दोष मेरा ना था, पर मैं बदनाम था,
हर कोई मुझपर तोहमत लगाता गया ||

मेरे चेहरे का कुछ और ही हाल था,
दाँत थे हिल रहे, जबड़ा बेहाल था ||
देखकर शर्मा गया आईना भी मुझे ,
अपना परिचय जब उससे कराने लगा ||

पेट मे थी कसक, पैर बेहाल था,
पीठ पर दर्द का आया भूचाल था ||
भूलकर दर्द को घर से निकला ही था,
शोर आने लगी वो गया साल था ||

उसने दस्तक दिया मेरे दर पर बहुत ,
फोने कर के मुझे फिर बुलाता रहा ||
पी के सोया था घर मे जो उस रात को ,
बॉस दो रात तक फिर जगाता रहा ||

Thursday, December 25, 2008

नखरे पड़ोसन के.||||........||||

यार पड़ोसन के बच्चे, अब अपने जैसे दिखते है |
दर्द यही है बस दिल मे, वो मुझको अंकल कहते है ||

है ढीला- ढाला नेबर मेरा , पर यार पड़ोसन टाईट है |
जितने मे मेरा ब्रेकफास्ट, उतनी जानम की डाएट है ||

मैं अमजद जी सा टाईट, वो यार तनुश्री दिखती है |
यार खड़ी जब बालकोनी मे, तिरछी नज़रों से तकती है ||

था यार अटल सा सुस्त कभी,अब लालू जैसा दिखता हूँ |
वो यार दूधारू भैंस मेरी, और मैं बाल्टी जैसा तकता हूँ ||

दिल में कुछ-कुछ होता है, जब उसको देखा करता हूँ |
नखरे सब सहता हूँ उसके, और लव-यू लव-यू कहता हूँ ||

सायद ये मेरे ख्वाब कभी, झटके से सच हो जाएँगे |
जब यार पड़ोसन के बच्चे, मुझे अब्बा कहकर बुलाएँगे ||

यार पड़ोसन के बच्चे, अब अपने जैसे दिखते है |
दर्द यही है बस दिल मे, वो मुझको अंकल कहते है ||

बीते बातों की चादर....

बीते बातों की चादर से, मैं घाव पुराने ढकता हूँ |
फिर यार पुराने जख्मो पर, यादों का मरहम रखता हूँ ||

कुछ यादें मुझे लुभाती है, कुछ यादें हमे रूलाती है |
फिर अश्क बहाकर मै अपने, यादों की खेती करता हूँ ||

यार किसी के यादों संग, मै खुद को भुला करता हूँ |
फिर यार पुराने बातों मे, मैं खुद को खोजा करता हूँ ||

कैसा दिखता था तब मै, ये खुद से पूछा करता हूँ |
उसके कदमो के आहट से,मैं अब भी चौंका करता हूँ ||

चुप रह कर भी वो उसका, सारी बातें कह जाना |
वो उसका झुक कर चलना, फिर धीरे से मुस्काना ||

वो चादर जितनी लम्बी है, यादे उतनी ही गहरी है |
आसान है इसमे खोना पर, मुस्किल है बाहर आना ||

बीते बातों की चादर से, मैं घाव पुराने ढकता हूँ |
फिर यार पुराने जख्मो पर, यादों का मरहम रखता हूँ ||

Sunday, November 30, 2008

बाँध सबर का टूट ना जाए (पाक की औकात )

जब ख़ौफ़ नही है मरने का, फिर मुद्दा क्या है डरने का |
सब एक साथ ही आ जाओ, यूँ लूक्का-छिप्पि करना क्या ||

यूँ बारी-बारी तड़प-तड़प, कापुरुषों सा अब जीना क्या |
नापाक इरादों के गिरगिट, यूँ रंग बदल अब जीना क्या ||

है जिस्म हमारा भारत से, फिर भारत मे मिल जाएगा |
पर जब ठनका माथा अपना, तू भाग कहाँ फिर जाएगा ||

हम तो बारुदों पर चल कर, यहाँ इस मुकाम पर आए है |
इतनी तेरी औकात ना थी , हम जितना सहते आये है ||

ये ताज नही है फूलों का , जब चाहा इसे पहन लोगे |
गर हुई हिमाकत फिर ऐसी, लाहौर भी तुम तब खो दोगे ||

बाँध सबर का टूट ना जाए, ये दुआ करो अपने रब से |
खोज ना पाओगे खुद को , जब भूले से भी हम सनके ||

भीख के धन पर ऐश करो, ना ऐसे व्यर्थ गावओ तुम |
छोड़ो चिंता अब धर्म-क़ौम की, खुद का घर बनवओ तुम ||

करने को पूरा पाक ध्वस्त, यहाँ एक जवान ही काफ़ी है |
यहाँ करने से पहले कुछ भी, सौ बार सोचकर आना तुम ||

यहाँ लुक-छिप गोलाबारी कर, तुम हमे हिला ना पाओगे |
हमे मिटाने की चाहत मे, खुद मिट्टी मे मिल जाओगे ||

है जिस्म हमारा भारत से, फिर भारत मे मिल जाएगा |
पर जब ठनका माथा अपना, तू भाग कहाँ फिर जाएगा ||

Tuesday, November 25, 2008

सूखे शब्दकोष

भाव भुला कहीं, रस का अभाव सा,
खो गये रंग भी, और अलंकार भी |
सोच कुंठित हुई, शब्द भी खो गये,
पात्र झूठे लगे, ज़िंदगी के मुझे ,
ज़िंदगी भी मुझे आज झूठी लगी |
शब्द सागर मे एक बूँद बाकी नही,
भाव सागर भी मुझको यू खाली मिली |
जब भी चाहा की कुछ मै नया सा लिखूं,
मुझको हर मोड़ पर फिर उदासी मिली |
सूत्रो मे मैं बँधा ही रहा हर घड़ी,
सोच को भी जहाँ कुछ आज़ादी ना थी |
था मात्रा की गड़ना से आज़ाद मै,
चार चरणो से खुद को बचा ना सका |
भाव भुला कहीं, रस का अभाव सा |
खो गये रंग भी, और अलंकार भी |

Friday, November 14, 2008

उपहार !!

लंबा है पथ, खुली सड़्क है,
अपनो का अंबार सज़ा है |
जब तक कुछ दे सकते हो,
बस तब तक संसार खड़ा है |

जब चाहोगे प्यार मिलेगा,
खुशियो का संसार मिलेगा |
जब तक मुठ्ठी बँधी हुई है ,
बस तब तक सम्मान मिलेगा |

इस भीड़- भाड़ की दुनियाँ मे,
अब तुझको भी स्थान मिलेगा |
भरा हुआ है गला जभि तक,
बस तब तक ही दान मिलेगा |

हर शुख सुविधा द्वार खड़ी है,
अब तुझको गले लगाने को |
है जब तक गिरवी रखने को,
बस तब तक उपहार मिलेगा |

पूजा भी फलदायक होगी,
"आनंद" भी वरदान मिलेगा |
जब तक त्याग करोगे तुम,
बस तब तक परिवार मिलेगा |

कुछ देने का प्रण कर लो,
तो तुझको भी संसार मिलेगा |
साथ रहे जो हर शुख दुख मे,
अब ढूँढे से वो यार मिलेगा |

लंबा है पथ, खुली सड़्क है,
अपनो का अंबार सज़ा है |
जब तक कुछ दे सकते हो,
बस तब तक संसार खड़ा है |

Saturday, October 25, 2008

मने ऐसी दिवाली अब !!!



हो सारी बात शुखदायी,
जो बीते ज़िंदगी मे अब |
जलाओ अब दिए ऐसे,
जगमग हो यहाँ हर कण |

ना कोई यार गुम-सूम हो
ना कोई यार हो चुप-चुप |
खुले अब गाँठ सब दिल के,
मने ऐसी दिवाली अब |

ना कोई यार हो भूखा,
ना कोई घर अंधेरा हो |
मिले ऐसे गले अब कि,
फिर रातों मे सबेरा हो |

इस प्यार के बाज़ार मे,
अब मंदी ना हो कोई |
मुनाफ़ा हर जगह फैले,
मने ऐसी दिवाली अब |


आप सभी को मेरी तरफ से हार्दिक शुभ कामनए!!

Tuesday, October 21, 2008

" ऊर्जा "आज का युवा और गिरती राजनीति


ऊर्जा हमी मे है कि हम, ब्राम्‍हांड का निर्माण कर दें |
और जब भटके कभी तो, विश्‍व का निर्वाण कर दें |

चाहे तो हमे कर नियंत्रित, उर्जा का भंडार कर लो |
या तो घट जाए ग़लत कुछ, इससे पहले ही निकल लो |

हम भी काँटों से बने है, ना समझ हमे फूल रौंदो |
नासूर बन जाए यहाँ ,तुम इससे पहले ही सुधर लो |

छोटे से ढेले है, ना मसलो , चूर हम हो जाएँगे |
पर उड़ के आँखो मे गये तो, आँख ही ले जाएँगे |

बन के तमासाई ,ना अब तमाशा यार देखो |
गर मदारी हम बने, बंदर हमारे यार तुम हो |

है अनियंत्रित कण, हम जब निकले तो टकराएँगे |
अपनी तो हस्ती नही कुछ,तुझको मिटा कर जाएँगे |

रोक लो आँधी, और बहने दो हवा कुछ मंद |
खुशबू हो चारो तरफ, और फैला हो आनंद |

Friday, October 17, 2008

१२०२७ रन बनाने के लिए सचिन "रिकॉर्ड " तेंदुलकर को हार्दिक बधाई !!!!




मुस्किलों से ही सही,
टूटा है फिर एक आसमाँ |
और विश्‍व के पृष्ट पर,
चमका है फिर ये हिंदोस्ता |

गर्व हमको है यहाँ ,
अब जन्म लेने के लिए |
जन्म लेते हो जहाँ ,
सदियों मे ऐसे सूरमा |

टूटते बनते रहेंगे ,
यार ऐसे कीर्तिमान |
पर नही आएगा अब,
तेंदुलकर सा सूरमा |