Sunday, July 3, 2011

पाती

आग कुछ ऐसी लगी,
रिश्तों के खर पतवार में |
ढाई आखर भी नहीं,
कह पाए हम फिर आप से |
वो राह के रिश्ते ना थे,
जो जुड़ गए खुद आप से |
खुद आपने भेजी थी पाती,
दोस्ती के आस से |

Monday, February 7, 2011

आज भी भुला नहीं, कॉलेज में पहला दिन तेरा |

आज भी धुंधले सही,
पर याद हैं कुछ रास्ते |
एक वो है जिस पर घर तेरा,
दूजा जहां देखा तुझे |

सोचा कभी सच बोल दूँ,
सब भेद दिल के खोल दूँ |
पर रुक गएँ पग, जम गएँ लभ |
जब सामने देखा तुझे |

वो झुक के चलने कि अदा,
चेहरे पर  बालों कि घटा |
वो डर से सहमा तन बदन,
कैसे मैं भुलूँ वो दास्ताँ |

ऐसा न कि देखा नहीं,
चंचल बदन, मुख चन्द्रमा |
पर आज भी भुला नहीं,
कॉलेज में पहला दिन तेरा |
 

Friday, December 17, 2010

पिघल रहा वो चन्दन सा तन

अपना तो मैं भूल चूका हूँ ,
बस तेरी यादें बाकि है |
भूली बिसरी शरद में लिपटी,
तेरी अह्सासें बाकि है |
याद ना हो तुझको शायद ,
तेरी यौवन का अल्हड़पन |
तेरी हर एक कमर के बल पर ,
वर्षों से रूहें  घायल है | 
बारिस  कि बूँदों से घायल,
पिघल रहा वो चन्दन सा तन |
तेरी साँसों कि गर्मी  से,
अब भी मेरी रातें पागल है |
माना याद नहीं तुमको कुछ,
ख़त, दस्तखत, वादें , यादें तक |
पर तेरी दांतों के बल पर,
मेरी जस्बातें घायल है | 
बारिस  कि बूँदों से घायल,
पिघल रहा वो चन्दन सा तन |
भूली बिसरी शरद में लिपटी,
तेरी अह्सासें बाकि है |

Saturday, November 27, 2010

याद.........

यकीं तो है कि फिर रंगत चमन कि लौट आएगी,
मगर सब जख्म भर जाए, मुझे मुमकिन नहीं लगता |
तुम्हारी याद दामन में, चिकोटेंगी मुझे जब भी,
तुम्हे मैं भूल पाऊँगा, मुझे मुमकिन नहीं लगता |
बड़ी मुश्किल से तेरी याद को, मैंने किया रुखसत,
मगर तू याद न आए, मुझे मुमकिन नहीं लगता |

Thursday, September 30, 2010

इन्सान बाँट डाला

अब बांटने  का चस्का,
ऐसा लगा आनंद |
घर-बार बाँट  डाला,
और प्यार बाँट डाला |
जो फिर भी सुकूँ ना आया,
तो  संसार बाँट डाला  |
इधर छू कर गयी नहीं,
हवा साजिस लिए कोई |
हमने उधर तपाक से ,
जिस्म रूह बाँट  डाला |
ऊपर है जिसका राज़,
वो सायद जुदा ना हो  |
हमने जिसके नाम पर,
इन्सान बाँट डाला |

Saturday, September 4, 2010

फासले दरमियाँ

तुम्हे फुर्सत  ना थी, 
और हम भी व्यस्त  बहुत थे |
फिर ये जो फासले है दरमियाँ , 
वो  बे-वजह नहीं |
तुम खुद में थे मगन, 
और हम दुनिया कि खोज में |
ये लम्बी राह जो है दरमियाँ,
ये बे-वजह नहीं |

Monday, July 19, 2010

हंस बनना चाहता हूँ |

खुद को रंग चुने में मैं भी,
हंस बनना चाहता हूँ |
हाँथ में जो बंध ना पाए,
 वों रेत बनना चाहता हूँ |
रोज़ सपनों में जिसे मैं, 
देखता हूँ,  रात  भर,
बस उसी सपने को मैं,
अंजाम देना चाहता हूँ |
माना कि मुझसे खफा,
होकर के बैठी है  कही,
बस आज उस तक़दीर का,
मैं साथ देना चाहता हूँ |
नाम तेरा मैं भी लिख सकता था,
दीवारों पर मगर,
मैं तुम्हे गंगा के जैसा,
साफ रखना चाहता हूँ |
नाम जुड़कर के मेरा,
बदनाम ना कर दे तुम्हे,
बस इसी डर से, 
मैं तुझसे दूर रहना चाहता  हूँ |
ना नींद में यादें मेरी,
फिर आ के झकझोरे तुम्हे,
इसलिए यादों में खुद ही,
दफन  होना चाहता हूँ |
फिर इकिंचित नाम सुनकर के मेरा,
 तुम्हे दर्द ना हो,
खुद को रंग चूने में मैं भी,
हंस बनना चाहता हूँ |

Sunday, July 11, 2010

आखिरी राह

जो आज मेरा है,
कल किसी और का होगा,
इस बाज़ार में कुछ,
 बे वज़ह नहीं होता  |
जुड़ें है लोग यहाँ ,
अपने किसी मकसद से,
बिना मतलब के कोई, 
साथ अब  नहीं देता |
वों वक्त और था,
जब खून बहा देतें थे,
अब बिना स्वार्थ
कोई हाँथ भी नहीं देता |
हर कोई बाटना चाहेगा,
ख़ुशी तेरे संग,
तेरा गम बांटने को, 
कोई भी नहीं होगा |
जब तक जिंदा हो,
ये बोझ उठा कर चल लो,
आखिरी राह में कोई
हम सफ़र नहीं मिलता |
यहाँ आनंद सबको,
फिक्र है बस अपनों कि
बे वजह बात,
ज़माने कि वों नहीं करता |

Thursday, May 20, 2010

मैं कवि बन गया ......

तुम ग़ज़ल बन के जो,
आ गयी सामने |
बस तुम्हे पढके ही,
मैं कवि बन गया |
तेरी हर इन्द्रियाँ,
यूँ थी अनुपात में |
देखते देखते ही,
नज़म गढ़ दिया |
तेरे यौवन कि मदिरा,
बही इस तरह |
घूरते-घूरते मैं,
कहीं बह गया |
होंठ से दाँत कि,
जंग को देख कर,
क्या बताऊँ तुम्हे,
मैं कहाँ खो गया |

Sunday, May 9, 2010


जो कुछ भी हूँ बस तुमसे हूँ,
तुमरे बिन मेरा कौन सहारा |
धन्य हुआ यह जीवन पा के,
गर कुछ कर पाऊं भाग हमारा |

मदर's day ki hardik shubh kamnaye...
HAPPY MOTHER'S DAY